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भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा

भगवती अहिंसा…. भीयाणं पि व सरणं

भगवती अहिंसा भीतों (डरे हुओं) के लिए शरण के समान है

भीत अर्थात् संकटग्रस्त डरा हुआ व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए किसी समर्थ व्यक्ति की शरण ढूँढता है| शरण या आश्रय मिल जाने पर शरणार्थी सन्तुष्ट हो जाता है – निर्भय हो जाता है; वैसे ही भगवती अहिंसा का आश्रय लेने पर भी व्यक्ति सन्तुष्ट एवं निर्भय हो जाता है|

शरण का अर्थ घर भी होता है| शीत, गर्मी, वर्षा, आँधी आदि से बचने के लिए जिस प्रकार मनुष्य घर का आश्रय लेता है, उसी प्रकार भावी उपद्रवों-कष्टों यातनाओं से बचने के लिए भगवती अहिंसा का आश्रय लेना चाहिये|

हिंसा का फल पाप है और पाप का फल दुःख| यदि कोई व्यक्ति दुःखों को निमन्त्रण नहीं देना चाहता; तो उसे पापों से बचने का प्रयास करना चाहिये| पापों से बचने के लिए हिंसा का त्याग करना होगा| यह संकल्प करना होगा कि मन से, वचन से और काया से किसी जीव की हिंसा अथवा प्राणातिपात न करूँगा, न कराऊँगा और न करनेवालों का अनुमोदन ही करूँगा|

ऐसा संकल्प करनेवाला श्रमण ही सच्चा उपासक है – भगवती अहिंसा का|

- प्रश्‍नव्याकरण 2/1

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