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कल्याणकारिणी

कल्याणकारिणी

अहिंसा तसथावरसव्वभूयखेमंकरी

अहिंसा त्रस एवं स्थावर समस्त भूतों (प्राणियों) का कल्याण करनेवाली है

जीव दो प्रकार के होते हैं – सिद्ध, जो कर्मों से सर्वथा रहित हैं और संसारी, जिनसे कर्म चिपके हुए हैं|

संसारी जीवों के भी दो प्रकार हैं – त्रस और स्थावर| लट, खटमल, भौंरा, सॉंप, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि द्वीन्द्रिय से लेकर पञ्चेन्द्रिय पर्यन्त समस्त चलने-फिरनेवाले जीव त्रस कहलाते हैं| इनसे विपरीत जो चलने-फिरने में असमर्थ हैं, वे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं वनस्पति के एक इन्द्रिय वाले समस्त जीव स्थिर होने से ‘स्थावर’ कहे जाते हैं|

अहिंसक व्यक्ति किसी भी जीव को कष्ट देना नहीं चाहता; क्यों कि वह जानता है कि जिस प्रकार मैं जीना चाहता हूँ, वैसे ही सभी प्राणी जीना चाहते हैं और जैसे मैं मरना नहीं चाहता, वैसे सभी अन्य प्राणी भी मरना नहीं चाहते| वह यह भी सोचता है कि जैसे मैं नहीं चाहता कि मुझे कोई अन्य जीव कष्ट दे; वैसे ही अन्य जीव भी दूसरों के कष्टों से घबराता हैं – बचना चाहते हैं| इस विचारधारा के कारण अहिंसक किसी जीव की हिंसा नहीं करना चाहता; भले ही वह त्रस हो या स्थावर| इस प्रकार अहिंसा कल्याणकारिणी है|

- प्रश्‍नव्याकरण 2/1

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