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पूज्य शिष्य

पूज्य शिष्य

जो छंदमाराहयइ स पुज्जो

जो इंगिताकार से स्वीकार करता है वह पूज्य बनता है

जो आवश्यकता और गुरुजनों की इच्छा को समझकर बिना कहे अपने कर्त्तव्य का पालन करता है, वह उत्तम शिष्य है|

जो कहने पर गुरुओं के आदेश का पालन करता है, वह मध्यम श्रेणी का शिष्य है|

परन्तु जो शिष्य बार-बार कहने पर भी गुरुजनों के आदेश की अवहेलना करता है, वह अधम है|

छन्द या अभिप्राय की आराधना अर्थात् अनुपालन करनेवाला पूज्य होता है – इस सूक्तिवाक्य द्वारा आज्ञापालन की ही नहीं, बल्कि उत्तम शिष्य बनने की भी प्रेरणा दी गई है|

इस प्रेरणा को जो ग्रहण करेगा अर्थात् जो शिष्य गुरुजनों के अभिप्राय को समझकर बिना उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा किये ही उनके अभिप्राय के अनुसार अपने कर्त्तव्य का पालन करेगा, वह चतुर विवेकी विनीत शिष्य सबके लिए आदरणीय होगा – समाज के लिए उसका जीवन अनुकरणीय होगा – पूज्य होगा|

- दशवैकालिक सूत्र 6/3/1

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