post icon

पहले ज्ञान, फिर दया

पहले ज्ञान, फिर दया

पढमं नाणं तओ दया

पहले ज्ञान, फिर दया

दया धर्म की माता है तो ज्ञान धर्म का पिता है| ज्ञान और दया के समन्वय से ही धर्म की उत्पत्ति हो सकती है, अन्यथा नहीं|

यदि ज्ञान और दया में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाये तो हम किसे चुनेंगे? यदि बीज और फल में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाये तो हम किसे चुनेंगे?

अधिकांश व्यक्ति फल को चुनना पसन्द करेंगे; क्योंकि उससे तत्काल पेट भर सकता है – स्वाद का आनन्द मिल सकता है; परन्तु यह दूरदर्शिता नहीं है| बीज में आज भले ही पेट भरने की शक्ति या स्वादिष्टता न हो; परन्तु उसमें अनेक फल पैदा करने का सामर्थ्य निहित है – इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता; इसी प्रकार ज्ञान का सामर्थ्य भी अद्भुत है| वह किसी व्यक्ति से जीवन भर दृढ़तापूर्वक दया का पालन करा सकता है| अनेक क्रूर एवं दुष्ट व्यक्तियों के मस्तिष्क पलट सकता है और उन्हें दयालु बना सकता है|

इसलिए दया की अपेक्षा ज्ञान का महत्त्व अधिक है| पहले हमें सम्यग्ज्ञान संपन्न होना चाहिये, फिर दया का पालन- शुद्ध क्रियात्मक प्रवृत्ति में प्रवृत्त होना चाहिये|

- दशवैकालिक सूत्र 4/10

Did you like it? Share the knowledge:

Advertisement

No comments yet.

Leave a comment

Leave a Reply

Connect with Facebook

OR