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वाणी के गुण

वाणी के गुण

मियं अदुट्ठं अणुवीइ भासए,
सयाण मज्झे लहइ पसंसणं

जो विचारपूर्वक परिमित और निर्दोष वचन बोलता है, वह सज्जनों के बीच प्रशंसा पाता है

बोलते सब हैं, किन्तु ऐसे कितने व्यक्ति हैं, जो वास्तव में बोलना जानते हैं?

क्या आप वाणी के गुणों से परिचित नहीं हैं ? यदि हॉं, तो लीजिये, यह सूक्ति आपका मार्गदर्शन करनेको तैयार है| इसमें बताया गया है कि हमारी वाणी में तीन गुण होने चाहिये:-

(1) परिमितता – हम जो कुछ बोलें, वह संक्षिप्त हो – कम से कम शब्दों में हो – सारगर्भितहो|

(2) दोषरहितता – उच्चारण ठीक हो अर्थात् ह्रस्व अक्षर का उच्चारण र्‍हस्व हो और दीर्घका उच्चारण दीर्घ| व्याकरण की दृष्टि से भी वाक्यरचना निर्दोष हो| “मरमवचन जब सीता बोला| सुनिकै तब लछमन मन डोला|” यहॉं ‘डोला’ से तुक मिलाने के लिए ‘बोला’ किया गया है, जो अशुद्ध है| ‘सीता बोली’ होना चाहिये| यह एक उदाहरण है – सदोष वाणी का|

(3) विचारकता – पहले खूब सोच लें, फिर बोलें अर्थात् विचारपूर्वक बोलें|

यदि हमें पानी हो सज्जनों के बीच प्रशंसा; तो अपनायें वाणी के ये गुण|

- दशवैकालिक सूत्र 7/55

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