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पाप न करें, न करायें

पाप न करें, न करायें

पावकम्मं नेव कुज्जा न कारवेज्जा

पापकर्म न स्वयं करना चाहिये और न दूसरों से कराना चाहिये

पुण्य का फल सुख है और पाप का फल दुःख | सुख सब चाहते हैं, फिर भी पुण्य करने में आलसी बनते हैं और दुःख कोई नहीं चाहता, फिर भी सावधानी पूर्वक दुःख के कारणों का अर्थात् पापों का सेवन करते हैं| कैसी विचित्र बात है यह?

बहुत-से लोग ऐसे होते हैं, जो स्वयं तो कोई पापचरण नहीं करते; परन्तु दूसरों को पाप के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं| ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार बहुत-से लोग स्वयं तो लड़ाई-झगड़े से दूर रहते हैं, परन्तु दूसरों को उल्टी-सीधी भिड़ाकर लड़ाई भड़काते रहते हैं| दूसरे बेचारे लड़ते हैं – लहूलुहान हो जाते हैं और ये खड़े-खड़े तमाशा देखते रहते हैं| यह बुरी बात है| स्वयं लड़ना भी बुरा है और दूसरों को लड़ाना या दूसरों में लड़ाई भड़काना भी| इसी प्रकार पाप करना भी बुरा है और दूसरों से पाप कराना भी|

ज्ञानीजनों के अनुसार सुख चाहने वालों को चाहिये कि वे स्वयं कभी पाप न करें, न करायें|

- आचारांग सूत्र 1/2/6

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