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विचार वैभिन्य

विचार वैभिन्य

पुढो छंदा इह मानवा

यहॉं मनुष्य विभिन्न रुचियों वाले हैं

इस संसार में हम देखते हैं कि मनुष्यों का परस्पर स्वभाव भिन्न-भिन्न होता है – उनकी रुचियॉं भिन्न-भिन्न होती हैं – उनके विचार भिन्न-भिन्न होते हैं| यहॉं तक कि एक ही मनुष्य के विचार भी समान नहीं रहते-विभिन्न समयों में विभिन्न होते हैं|

कारण यह है कि स्वभाव हो, विचार हो या रुचियॉं-सब परिस्थिति पर निर्भर हैं| परिस्थिति के अनुसार इन मनोवृत्तियों में स्थिति या परिवर्तन होता रहता है| युद्ध के प्रसंग पर वीररस का जो काव्य रोचक लगता है, वह विवाह के अवसर पर नहीं लगता| इसी प्रकार विवाह के अवसर पर श्रृंगाररस के जो गीत गाये जाते हैं, वे मरण के अवसर पर नहीं गाये जा सकते|

सांसारिक व्यवहार में इस बात का जैसे ध्यान रखा जाता है, वैसे ही कुशल उपदेशक को भी इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिये| कौन नहीं जानता कि विवाह की अपेक्षा मृत्यु के अवसर पर दिया गया वैराग्य का उपदेश अधिक प्रभाव डाल सकता है? सचमुच परिस्थिति के अनुसार मनुष्यों के विचारों में वैभिन्य होता है|

- आचारांग सूत्र 1/5/2

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