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कायोत्सर्ग

कायोत्सर्ग

वोसिरे सव्वसो कायं, न मे देहे परीसहा

सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं

‘काउसग्ग’ एक पारिभाषिक शब्द है, जिसे संस्कृत में ‘कायोत्सर्ग’ कहते हैं| यह शब्द काया+उत्सर्ग से बना है| काया शरीर को कहते हैं और उत्सर्ग त्याग को; परन्तु कायोत्सर्ग का अर्थ ‘शरीर का त्याग’ नहीं है| इसका अर्थ है शरीर के मोह का त्याग| कायोत्सर्ग के बाद ही ध्यान में एकाग्रता आ सकती है|

ध्यान करते समय मन शरीर को भूल जाता है, मानो वह है ही नहीं| इस प्रकार शरीर पर उसकी जो ममता है वह भी छूट जाती है| उस अवस्था में शरीर पर कोई भी संकट आये – भूख, प्यास, शीत, उष्णता, डांस, मच्छरों का दंश, मार-पीट, वर्षा आदि – वह शान्ति से सह लेता है; क्यों कि शरीर की उपेक्षा कर देने से साधक अपने भीतर ऐसा अनुभव करता है – मानो कोई परीषह है ही नहीं; क्यों कि ध्यान करने से पहले वह सङ्कल्प करता है – ‘‘मैं अपने शरीर की ममता का परित्याग करता हूँ – कोई परीषह मुझे परेशान नहीं कर सकता|’’

- आचारांग सूत्र 1/8/21

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