क्यारे मुने मिलश्ये माहरो संत सनेही?
क्यारे मुने मिलश्ये माहरो संत सनेही?
संत सनेही सुरीजन पाखे राखे न धीरज देही
क्यारे मुने मिलश्ये माहरो संत सनेही?
क्यारे मुने मिलश्ये
अवधू! क्या मागुं गुनहीना
अवधू! क्या मागुं गुनहीना?
वे गुनगनन प्रवीना,
अवधू! क्या मागुं गुनहीना?
गाय न जानुं बजाय न जानुं न जानुं सुरभेवा,
रीझ न जानुं रीझाय न जानुं न जानुं पदसेवा.
क्युं न हो सुनाइ स्वामी
श्री सुपार्श्वनाथ जिन स्तवन
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एक मुज विनती निसुणोज़
श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिन स्तवन
मुनिसुव्रत जिनराय,
एक मुज विनती निसुणोज़
आतमतत्त्व क्युं जाणुं जगद्गुरु,
एह विचार मुज कहीयो;
आतमतत्त्व जाण्या विण निरमल,
चित्तसमाधि नवि लहियो
धर्म जिनेसर गाउं रंगशुं
श्री धर्मनाथ जिन स्तवन
धर्म जिनेसर गाउं रंगशुं,
भंग न पडशो हो प्रीत जिनेश्वर;
दुजो मन मंदिर आणुं नहीं,
ए अम कुळवट रीत.
चोत्रीश अतिशयवंत
भाव : दान धर्म…ना बधाज मुख्य प्रकारनी समजण
चोत्रीश अतिशयवंत,
समवसणे बेसी हो जगगुरु;
उपदेशे अरिहंत,
दानतणा गुण हो पहेले सुखकरू.
में कीनो नहीं तुम बीन और शुं
श्री सुविधिनाथ जिन स्तवन
राग : भजोरी प्यारो नमिजीणंद.. (भीमपलाश)
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सुविधि जिनेसर पाय नमीने
श्री सुविधिनाथ जिन स्तवन
राग : केदारो – ‘‘एम धन्नो धणने परचावे रे…’’ ए देशी
सुविधि जिनेसर पाय नमीने, शुभ करणी एम कीजे रे;
अति घणो ऊलट अंग धरीने, प्रह ऊठी पूजीजे रे.
अब मोहे तारो सुमति जिनेश
श्री सुमतिनाथ स्तवन
राग : वाघेश्वरी
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अवधू ! आज सुहागन नारी
आज सुहागन नारी अवधू ! आज सुहागन नारी,
मेरे नाथ आप सुध लीनी कीनी निज अंगचारी.









