राग : लख्युं होय ते थाय भविष्यमां सजनवा वैरी हो गइ हमार
भाव : कर्मसत्तानी अमाप ताकात अने ए ताकातने पडकारती धर्मसत्ता
करवुं होय ते थाय करमने करवुं होय ते थाय;
जीवे जाच्युं काम न आवे,
धार्युं निरर्थक जाय.
राग : लख्युं होय ते थाय भविष्यमां सजनवा वैरी हो गइ हमार
भाव : कर्मसत्तानी अमाप ताकात अने ए ताकातने पडकारती धर्मसत्ता
करवुं होय ते थाय करमने करवुं होय ते थाय;
जीवे जाच्युं काम न आवे,
धार्युं निरर्थक जाय.
श्री कुंथुनाथ जिन स्तवन
कुंथुजिन! मनडुं किमही न बाजे,
हो कुंथुजिन! मनडुं किमही न बाजे;
जिम जिम जतन करीने राखुं,
तिम तिम अलगुं भाजे हो
राग : गुरु बिन कौन बतावे वाट वागेश्वरी
भाव : विषय लगन नी चाह ने मिटाववा माटे नु दर्दभर्यु ब्यान
विषयकी कैसे कटे मोरी चाह,
करती यह फनाह.
पांच ईन्द्रियो पोषे इसको,
मन हैं ईसका नाह.
मेरे प्रान आनन्दघन तान आनन्दघन ॥ ए आंकणी॥
मात आनन्दघन, तात आनन्दघन
गात आनन्दघन, जात आनन्दघन
राग : धनाश्री
भाव : जगद्गुरु हीर सूरिजी म. सा. नुं जीवन वृत्तांत
श्री हीरसूरि गुरुराय,
हमारा हीरसूरि गुरुराय
प्रणमुं प्रभावक पाय,
हमारा हीरसूरि गुरुराय
तेरी हुं तेरी हुं कहुं री,
इन बातमें दगो तुं जाने
तो करवत काशी जाय ग्रहुं री.
भाव : ३ वर्षना बालमुनि वज्रस्वामी ने एमना जीवन नी अद्भुत कहानी
सांभळजो तुमे अद्भुत वातो,
वयर कुंवर मुनिवरनी रे;
षट् महिनाना गुरु झोळीमां,
आवे केलि करंता रे,
त्रण वरसना साधवी मुखथी,
अंग अगीयार भणंता रे.
श्री पार्श्वनाथ जिन स्तवन
(राग : राता जेवा फुलडाने)
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श्री अभिनंदन जिन स्तवन
राग : बागेश्चरी
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श्री ऋषभदेव (आदिनाथ) जिन स्तवन
राग : प्रभातीयु
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