लोभपत्ते लोभी समावइज्जा मोसं वयणाए
लोभ का प्रसंग आने पर लोभी झूठ बोलने लगता है
लोभ का प्रसंग आने पर लोभी झूठ बोलने लगता है
शरीर सादि है और सान्त भी
लोभी और चञ्चल व्यक्ति झूठ बोला करता है
जिसके विषय में पूरी जानकारी न हो, उसके विषय में ‘‘यह ऐसा ही है’’ ऐसी बात न कहें
मुखरता सत्यवचन का विघाता करती है
इच्छाओं को रोकने से ही मोक्ष प्राप्त होता है
श्रमणोपासक चार प्रकार के होते हैं – दर्पण के समान (स्वच्छ हृदय वाले), पताका के समान (चञ्चल हृदय वाले), स्थाणु के समान (दुराग्रही) और तीक्ष्ण कण्टक के समान (कटुभाषी)
एक ही झपाटे में जैसे बाज बटेर को मार डालता है, वैसे ही आयु क्षीण होने पर मृत्यु भी जीवन को हर लेती है