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कामासक्ति

कामासक्ति

कामेसु गिद्धा निचयं करेन्ति

कामभोगों में आसक्त रहनेवाले व्यक्ति कर्मों का बन्धन करते हैं

पॉंच इन्द्रियों में से चक्षुइन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रिय अर्थात् आँख और कान के विषय ‘काम’ कहलाते हैं – जैसे सुन्दर चित्र, नाटक, सिनेमा, मनोहर दृश्य, नृत्य आदि आँख के विषय हैं और श्रृङ्गाररस की कथाएँ या कविताएँ, फिल्मी गाने, विविध वाद्य, अपनी प्रशंसा, स्त्रियों या पुरुषों का मधुरस्वर, (स्त्रियों के लिए पुरुषों की और पुरुषों के लिए स्त्रियों की मीठी-मीठी बातें) आदि चक्षु एवं कान के विषय हैं| Continue reading “कामासक्ति” »

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सत्य की आज्ञा

सत्य की आज्ञा

सच्चस्स आणाए उवट्ठिए मेहावी मारं तरइ

जो मेधावी सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है, वह मृत्यु के प्रवाह को तैर जाता है

जीवन में पद-पद पर अनुशासन की आवश्यकता का अनुभव होता है| विनय या अनुशासन से रहित अविनीत एवं स्वच्छन्द व्यक्ति अपने और दूसरों के कष्ट ही बढ़ाता है| ऐसी हालत में स्वपरकल्याण की तो उससे आशा ही कैसे की जा सकती है? Continue reading “सत्य की आज्ञा” »

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झूठ बोलने लगता है

झूठ बोलने लगता है

लोभपत्ते लोभी समावइज्जा मोसं वयणाए

लोभ का प्रसंग आने पर लोभी झूठ बोलने लगता है

झूठ बोलने के अनेक कारण हैं – क्रोध, मान, माया आदि; परन्तु लोभ सबसे बड़ा कारण है| जो लोभी व्यक्ति है, वह साधारण – से लाभ के लिए भी बात-बात पर झूठ बोलने को तैयार हो जाता है| Continue reading “झूठ बोलने लगता है” »

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मुक्त कौन है ?

मुक्त कौन है ?

विमुत्ता हु ते जणा, जे जणा पारगामिणो

जो जन (कामनाओं को) पार कर गये हैं, वे सचमुच ही मुक्त हैं

बन्धन ! कितना बुरा शब्द है यह ? कौन पसन्द करता है इसे ? कौन फँसना चाहता है इसमें ? कोई नहीं| Continue reading “मुक्त कौन है ?” »

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न बद्ध, न मुक्त

न बद्ध, न मुक्त

कुसले पुण नो बद्धे, नो मुत्ते

कुशल पुरुष न बद्ध होता है, न मुक्त

कुशल पुरुष का वर्णन यहॉं आलंकारिक भाषा में किया गया है| जो बद्ध है, वह मुक्त नहीं हो सकता और जो मुक्त है, वह बद्ध नहीं हो सकता | व्यक्ति या तो बद्ध होगा या फिर मुक्त| वह दोनों एक साथ नहीं हो सकता| Continue reading “न बद्ध, न मुक्त” »

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मोहग्रस्तता

मोहग्रस्तता

इत्थ मोहे पुणो पुणो सा,
नो हव्वाए नो पाराए

मोहग्रस्त व्यक्ति न इस पार रहते हैं, न उस पार

संसार क्षणभंगुर है| इसकी प्रत्येक वस्तु अस्थायी है- अस्थिर है; इसलिए विषयवासना की सामग्री भी ऐसी ही है; जिसके प्रति मुग्ध हो कर प्राणी इधर-उधर भटकते रहते हैं| Continue reading “मोहग्रस्तता” »

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उच्च नीच गोत्र

उच्च नीच गोत्र

से असइं उच्चागोए, असइं नीआगोए,
नो हीणे नो इहरित्ते

यह जीव अनेक बार उच्च गोत्रमें और अनेक बार नीच गोत्र में जन्म ले चुका है; परन्तु इससे न कोई हीन होता है, न महान|

उच्च गोत्र में पैदा होने से व्यक्ति अपने को महान समझ बैठता है और नीच गोत्र में पैदा होने से अपने को हीन या तुच्छ समझने लगता है; परन्तु ये दोनों ही बातें भ्रमपूर्ण हैं, क्यों कि व्यक्ति अनेक बार उच्च नीच गोत्रों में जन्म ले चुका है| Continue reading “उच्च नीच गोत्र” »

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वृद्धावस्था

वृद्धावस्था

से ण हासाए, ण किड्डाए,
ण रतीए, ण विभूसाए

वृद्ध होने पर व्यक्ति न हास-परिहास के योग्य रहता है, न क्रीड़ा के, न रति के और न शृंगार के ही

जन्म लेने के बाद प्रत्येक व्यक्ति शिशु, बालक, किशोर और तरुण बनकर क्रमशः वृद्धावस्था को प्राप्त करता है| यदि कोई किशोर चाहे के मैं तरुण न बनूँ; तो यह उसके वश की बात नहीं है| किशोरावस्था के बाद तारुण्य अनिवार्य है| Continue reading “वृद्धावस्था” »

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कर्म का मूल हिंसा

कर्म का मूल हिंसा

कम्ममूलं च जं छणं

जो क्षण है, वह कर्म का मूल है

‘क्षण’ शब्द ‘क्षणवधे’ इस तनादि गण की उभयपदी सकर्मक धातु से बना है, जिसका अर्थ है – हिंसा| वैसे इस शब्द के और भी अनेक अर्थ हैं – निमेषक्रिया का चतुर्थ भाग, उत्सव, अवसर आदि; परन्तु इस सूक्ति में उस का मूल अर्थ ‘वध’ या ‘हिंसा’ ही ठीक लगता है| Continue reading “कर्म का मूल हिंसा” »

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प्रमाद छोड़िये

प्रमाद छोड़िये

अलं कुसलस्स पमाएणं

कुशल व्यक्ति को प्रमाद नहीं करना चाहिये

मूर्ख व्यक्ति तो प्रमाद करते ही हैं; परन्तु जो व्यक्ति मूर्ख नहीं हैं-कुशल हैं – बुद्धि के स्वामी हैं – समझदार हैं, उनसे तो यह आशा नहीं की जा सकती कि वे प्रमादी बनकर अपना जीवन व्यर्थ खो दें| Continue reading “प्रमाद छोड़िये” »

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