आतुरा परितावेंति
आतुर परिताप देते हैं
आतुर परिताप देते हैं
मैं अकेला हूँ – मेरा कोई नहीं है और मैं भी किसी का नहीं हूँ
सबको जीवन प्रिय है, किसीके प्राणों का अतिपात नहीं चाहिये
हे पुरुष! तू सत्य को ही अच्छी तरह जान ले
मायावी और प्रमादी फिर से गर्भ में आते हैं
बुद्धिमान साधक लार चाटने वाला न बने अर्थात् परित्यक्त भोगों की पुनः कामना न करे
हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ
जिस श्रद्धा के साथ निष्क्रमण किया है, उसी श्रद्धा के साथ विस्त्रोतसिका (शंका) छोड़कर उसका अनुपालन करना चाहिये