एस वीरे पसंसिए, जे बद्धे पडिमोयए
वही वीर प्रशंसनीय बनता है, जो बद्ध को प्रतिमुक्त करता है
वही वीर प्रशंसनीय बनता है, जो बद्ध को प्रतिमुक्त करता है
जो एक अपने को नमा लेता है; वह बहुतों को नमा लेता है
आतंकदर्शी पाप नहीं करता
लाभ होने पर घमण्ड में फूलना नहीं चाहिये और लाभ न होने पर शोक नहीं करना चाहिये
सर्वथा काया को मोह छोड़ता हूँ – मेरी देह पर कोई परीषह जैसे है ही नहीं
सम्यग्दर्शी पाप नहीं करता
जो अभ्यन्तर को जानता है, वह बाह्य को जानता है और जो बाह्य को जानता है वह अभ्यन्तर को जानता है
कामभोगों में आसक्त रहनेवाले व्यक्ति कर्मों का बन्धन करते हैं
जो मेधावी सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है, वह मृत्यु के प्रवाह को तैर जाता है
लोभ का प्रसंग आने पर लोभी झूठ बोलने लगता है