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प्रियकर प्रियवादी

प्रियकर प्रियवादी

पियंकरे पियंवाइ, से सिक्खं लद्धुमरिहइ

प्रिय करनेवाला और प्रिय बोलनेवाला अपनी शिक्षा प्राप्त करने में समर्थ होता है

यदि कोई पशु या पक्षी प्यासा हो; तो उसे किसी जलाशय (सरिता, सरोवर, नाला आदि) के निकट जाना होगा| उसी प्रकार जिज्ञासु शिष्य को भी किसी गुरु के निकट जाना पड़ेगा; लेकिन ज्ञान की प्राप्ति के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है|

गुरु के अन्तेवासी तो अनेक होते हैं, परन्तु वे सभी ज्ञान नहीं बन जाते| जिज्ञासा, विनय, सेवा और प्रयास ज्ञान पाने के लिए आवश्यक हैं|

जो शिष्य ऐसे कार्य करता है, जिनसे गुरुदेव अप्रस हों अथवा जो शिष्य ऐसी वाणी का प्रयोग करता है, जिसमें से अविनय की दुर्गन्ध आती हो; तो गुरुदेव से वह कोई लाभ नहीं उठा सकता|

ज्ञानियों ने कहा है कि शिक्षा प्राप्त करने में केवल वही शिष्य सफल होता है, जो प्रियकर हो अर्थात् ऐसे कार्य करनेवाला हो, जो गुरुदेव को प्रिय लगते हों एवं जो प्रियवादी हो – मधुर, शिष्टतापूर्ण, विनययुक्त एवं मनोहर शब्द बोलनेवाला हो|

- उत्तराध्ययन सूत्र 11/14

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