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कीचड़ में न फँसें

कीचड़ में न फँसें

महयं पलिगोव जाणिया, जा वि य वंदणपूयणा इहं

संसार में जो वन्दन पूजन (सन्मान) है, साधक उसे महान दलदल समझे

प्रशंसा पाने का भी एक नशा होता है| नशे में जैसे आदमी औचित्य का विचार किये बिना मनमाना काम करता रहता है; वैसे ही प्रशंसा का भूखा व्यक्ति भी औचित्य की मर्यादा भूलकर जिस कार्य से अधिक प्रशंसा मिले, वही कार्य करने लगता है| वह यह भूल जाता है कि प्रशंसक सदा सत्यवादी नहीं होते| अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए वे झूठी प्रशंसा भी करते रहते हैं|

आदर-सत्कार से प्रसन्न होनेवाले व्यक्ति को धूर्त्त लोग उल्लू बनाते हैं| ऐसा व्यक्ति चापलूसों से घिरा रहता है और उनकी इच्छानुसार नाच नाचा करता है|

त्यागी साधक को तो इस ओर से सदा सावधान रहना चाहिये| उसके सारे कार्य आत्मकल्याण की दृष्टि से हों, वन्दन-पूजा की प्राप्ति उसका उद्देश्य न हो | ज्ञानी कहते हैं कि कीचड़ में फँसा हुआ व्यक्ति जिस प्रकार अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकता, उसी प्रकार वंदन पूजा (आदर-सत्कार, प्रशंसा) पाने के चक्कर में फँसा हुआ व्यक्ति भी अपना लक्ष्य नहीं पा सकता|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/2/2/11

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