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अमनोज्ञ शब्द न बोलें

अमनोज्ञ शब्द न बोलें

तुमं तुमं ति अमणुं, सव्वसो तं न वत्तए

तू, तुम जैसे अमनोहर शब्द कभी नहीं बोलें

मॉं को और ईश्‍वर को ‘तू’ कहा जाता है, शेष सबको ‘आप’ कहना चाहिये| ‘आप’ शब्द सन्मान दर्शक है| दूसरों से बातचीत करते समय अथवा पत्र व्यवहार में इसी शब्द का प्रयोग करना चाहिये| यदि हम दूसरों के लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करेंगे; तो दूसरे भी हमारे लिए ‘आप’ शब्द का प्रयोग करके हमें सन्मान देंगे|

जहॉं आप शब्द का प्रयोग होना चाहिये, वहॉं ‘तू’ या ‘तुम’ का प्रयोग अनुचित या अमनोज्ञ लगता है| दूसरों को जब ‘तू’ या ‘तुम’ कहा जाता है, तब सुनने वालों को बुरा लगता है और कहने वाले को वे घमण्डी समझ लेते हैं| घमण्डी व्यक्ति की बातें लोग रुचिपूर्वक नहीं सुन सकते|

सचमुच ये शब्द अपने को मर्यादा से या उचित से अधिक महत्वपूर्ण समझने और दूसरों को अपने से हीन या तुच्छ समझने की मनोवृत्ति के द्योतक हैं|

दूसरों को तुच्छ समझना स्वयं तुच्छता है, जो सत्पुरूषों में नहीं पाई जा सकती | वे दूसरों को भी सत्परामर्श देते हुए कहते हैं – ‘‘तू, तुम’’ जैसे अमनोज्ञ शब्द कभी न बोलें|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/6/27

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