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जीव और शरीर

जीव और शरीर

ओ जीवो अं सरीरं

जीव अन्य है, शरीर अन्य

‘‘मैं’’ शब्द से आत्मा या जीव का प्रत्यभिज्ञान होता है; इसलिए कुछ लोग ‘‘मै अन्धा हूँ’’ आदि प्रयोग देखकर इन्द्रियों को ही आत्मा मान बैठते हैं| कुछ लोग ‘‘मैं दोड़ता हूँ’’, ‘‘मैं बीमार हूँ’’, ‘‘मैं कपड़े धोता हूँ’’, ‘‘मैं स्नान करता हूँ’’, आदि प्रयोगों के आधार पर शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं|

कुछ लोग ‘‘मैं समझता हूँ’’ ‘‘मैं जानता हूँ’’ – ‘‘मैं पहचानता हूँ’’ आदि प्रयोग देखकर बुद्धि को जीव कह देते हैं| तो कुछ लोग ‘‘मैं सोचता हूँ’’, ‘‘मैं मानता हूँ’’ आदि के आधार पर मन को ही आत्मा समझते हैं|

परन्तु ‘‘मैं हूँ और मेरा अस्तित्व है’’ ऐसा अनुभव करने वाला ही वास्तव में जीव है; इन्द्रिय, शरीर बुद्धि या मन नहीं! अन्यथा मेरी इन्द्रियॉं, मेरा शरीर, मेरी बुद्धि एवं मेरा मन-ऐसा शब्दप्रयोग करने वाला कौन है?

शरीर और जीव के इस पार्थक्य के ज्ञान को ही भेद विज्ञान कहते हैं| शरीर तो मृत्यु के बाद यहीं जला दिया जाता है अथवा जमीन में दफना दिया जाता है, परन्तु जीव परलोक में जाता है| अतः मानना चाहिये – जीव अन्य है, शरीर अन्य|

- सूत्रकृतांग सूत्र 2/1/6

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