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वैरवृद्धि

वैरवृद्धि

परिग्गहनिविट्ठाणं वेरं तेसिं पवड्ढइ

जो परिग्रह में व्यस्त हैं, वे संसार में अपने प्रति वैर ही बढ़ाते हैं

जो अपने पास आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह करते हैं, वे अपने चारों ओर शत्रुओं की सृष्टि करते हैं| धन संग्रह के लिए नहीं, किन्तु अपनी और दूसरों की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए होता है| यह बात परिग्रही भूल जाते हैं|

परिश्रम करके धन का संग्रह करते हैं, परन्तु उसका उपयोग कैसे किया जाये| यह नहीं जानते| दूसरे लोग उनके धन को देखकर ईर्ष्यावश मन-ही-मन जलते रहते हैं| वे परिग्रही से प्रेम नहीं, घृणा करते हैं|

इसके विपरीत जो परिग्रही उदार होता है-विवेकी होता है – सार्वजनिक भलाई के कार्यों में सदा अपने धन का दान करता रहता है, उसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं – उससे सब लोग प्रेम करते हैं और मन-ही-मन उसकी दीर्घायु होने की कामना करते हैं|

ज्ञानियों ने कहा है कि उदारतापूर्वक अपने परिग्रह का उपयोग करते रहो; अन्यथा अनुदार (कंजूस) परिग्रही बनने पर तो तुम संसार में अपने प्रति वैरभाव ही बढ़ा लोगे|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/6/3

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