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चक्षु चाहिये

चक्षु चाहिये

सूरोदये पासति चक्खुणेव

सूर्य के उदय होने पर भी आँख से ही देखा जा सकता है

दर्पण सामने हो; फिर भी अन्धे को उसमें अपनी सूरत दिखाई नहीं देती| सूरत देखने के लिए अपनी आँख चाहिये|

शास्त्र सामने हों, फिर भी जिसमें बुद्धि नहीं होती, वह उन्हें नहीं समझ सकता| समझने के लिए बुद्धि का अस्तित्व अनिवार्य है|

ज्ञानी गुरुदेव समान रूप से ही सबको उपदेश देते हैं; परन्तु जिस शिष्य का जैसा क्षयोपशम होता है, वह उतना ही ग्रहण कर पाता है|

बूँद सीप में भी गिरती है और सॉंप के मुँह में भी; परन्तु एक स्थल पर वह मोती बनती है, अन्यत्र विष| अन्तर बूँद में नहीं है| गिरने से पहले उसका स्वरूप एक जैसा निर्मल है; परन्तु पात्रभेद से वह भि रूप में परिणत होती है|

ज्ञान का – उपदेश का परिणाम भी ग्रहण करने वालों की शक्ति, योग्यता एवं बुद्धि पर निर्भर होता है| स्वयं तीर्थङ्करदेव के समवसरण में भी भव्य जीवों को ही कल्याण-मार्ग सूझ पाता है, अभव्यजीवों को नहीं| सूर्य का उदय होने पर भी देखने के लिए तो अपनी ही चक्षु चाहिये|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/14/13

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