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संचित कर्मों का क्षय

संचित कर्मों का क्षय

तुट्टन्ति पावकम्माणि
नवं कम्ममकुव्वओ

जो नये कर्मों का बन्धन नहीं करता, उसके पूर्वसञ्चित पापकर्म भी नष्ट हो जाते हैं

हम जितना कुछ खाते हैं, वह सब मलद्वारसे ज्यों का त्यों नहीं निकल जाता| कुछ विष्टा के रूप में बाहर निकलता है और कुछ आँतों मे जमा रहता है- आँतों से चिपका रहता है और पड़ा-पड़ा सड़कर अनेक रोग पैदा करता है| आरोग्य के सन्देशवाहक कहते हैं कि हमें सप्ताह में एक उपवास करके पेट को विश्राम देना चाहिये| नया भोजन पेट में न पहुँचने पर वह चिपका हुआ संचित मल भी बाहर निकल जायेगा|

ठीक यही बात आध्यात्मिक क्षेत्र में भी होती है| जो व्यक्ति नये-नये कर्मों का बन्धन नहीं करता-सँभल कर सावधानीपूर्वक ऐसा व्यवहार करता है – ऐसा आचरण करता है – ऐसी दिनचर्या बनाता है कि नये कर्मों का बंधन ही न हो; तो इसका परिणाम क्या होगा? यही कि उसके पूर्व संचित अर्थात् पूर्वजन्मोपार्जित कर्म भी धीरे-धीरे नष्ट होते जायेंगे और एक दिन ऐसा आयेगा कि वह सर्वथा कर्मरहित होकर सर्वज्ञ बनकर मोक्षलक्ष्मी की प्राप्ति कर लेगा|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/15/6

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