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ज्ञान का सार

ज्ञान का सार

एवं खु णाणिणो सारं,
जं न हिंसइ किंचणं

अहिंसा या दया एक धर्म है; किन्तु इसका सम्यक् परिपालन करने से पहले ज्ञान होना आवश्यक है

जो व्यक्ति जीवाजीवादि नव तत्त्वों को अच्छी तरह से जान लेता है – इनके स्वरूप को हृदयंगम कर लेता है, वही सच्चा अहिंसक बन सकता है|

ऐसा व्यक्ति समझ लेता है कि जैसे मुझे अपना जीवन प्रिय है, वैसे प्रत्येक जीव को उसका जीवन प्रिय है और जिस प्रकार मैं मरना नहीं चाहता, वैसे ही संसार का कोई भी प्राणी मरने की कामना नहीं करता|

वह यह भी सोचता है कि यदि मैं किसी को प्राण दे नहीं सकता अर्थात् मुर्दे को जिन्दा नहीं कर सकता; तो मुझे किसी के प्राणों का अपहरण करने का भी क्या अधिकार है?

इस प्रकार उसकी विवेकमय मनोवृत्ति उसे अहिंसक बनकर दयाधर्म का पालन करते रहने के लिए प्रेरित करती है| यही तो है उसके ज्ञान का सार!

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/1/4/10

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