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असंविभागी

असंविभागी

असंविभागी न हु तस्स मोक्खो

जो संविभागी नहीं है अर्थात् प्राप्त सामग्री को साथियों में बॉंटता नहीं है, उसकी मुक्ति नहीं होती

जो अकेला ही प्राप्त सामग्री का भोग करता है, उसे बहुत कम सुख मिलता है| इसके विपरीत जो व्यक्ति दूसरे साथियों को बॉंट-बॉंट कर सबके साथ बैठ कर अपनी प्राप्त सामग्री भोगता है, उसे अधिक सुख का अनुभव होता है|

साथियों में सामग्री बॉंटने की बात कहने में जितनी सरल लगती है, करने में उतनी ही कठिन है; क्यों कि बॉंटने में यदि सबको थोड़ा-थोड़ | हिस्सा दिया और अपने पास अधिक रख लिया तो सब हमें स्वार्थी समझेंगे और साथियों में भी यदि किसी को कम और किसी को अधिक हिस्सा दे दिया गया तो जिसे कम मिलेगा, वह अपने को अपमानित अनुभव करके अप्रस होगा और बॉंटनेवाले को पक्षपाती समझेगा|

इसीलिए बॉंटनेवाले को संविभाग करने की सम्मति दी गई है अर्थात् प्रत्येक साथी को समान भाग दिया जाये और स्वयं भी उतना ही लिया जाये, जितना प्रत्येक को मिला है| बॉंटनेवाला यदि कुछ कम भी लेता है तो कोई बात नहीं| उससे उसकी प्रशंसा ही होगी – शोभा ही बढ़ेगी; परन्तु साथियों में तो सबको समान भाग ही मिलना चाहिये; क्यों कि असंविभागी मुक्त नहीं होता|

- दशवैकालिक सूत्र 6/2/23

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