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भक्तामर स्तोत्र – श्लोक 1

भक्तामर स्तोत्र   श्लोक 1

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् |
सम्यक् प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-
वालम्बनं भवजले पततां जनानाम् || 1 ||


अर्थ :

भगवान ऋषभदेव के चरण-युगल में जब देवगण भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं, तब उनके मुकुट में जड़ित मणियां प्रभु के चरणों की दिव्य कान्ति से और अधिक दैदीप्यमन हो जाती हैं| भगवान के चरणों का स्पर्श ही प्राणियों के पापों का नाश करने वाला है, तथा जो उन चरण-युगल का आलम्बन (सहारा) लेता है, वह संसार-समुद्र से पार हो जाता है| इस युग के प्रारम्भ में धर्म का प्रवर्तन करने वाले प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के चरण-युगल में विधिवत् प्रणाम करके (मैं स्तुति करता हूँ)|

भक्तामर स्तोत्र - यंत्र 1

ऋद्धि : ॐ ह्रीँ अर्हँ णमो अरिहंताणं णमो जिणाणं ॐ ह्रॉं ह्रीँ ह्रूँ ह्रौँ ह्रः अ सि आ उ सा अप्रतिचक्रे फट् विचक्राय झ्रौं झ्रौं स्वाहा|

मंत्र : ॐ ह्राँ ह्रीँ ह्रूँ श्रीँ क्लीँ ब्लूँ क्रौँ ॐ ह्रीँ नमः स्वाहा|

विधि : सफ़ेद कपडे पहन के, पूर्व दिशा में बैठके एक लाख जाप करके और यन्त्र पास रकखे सारी रिद्धि, उपलब्धि, संपति की प्राप्ति होती हैं|

प्रभाव : इस मंत्र का जाप करके, सारी विघ्न-बाधाएँ दूर हो जाती हैं और समृद्धि प्राप्त होती हैं|


संदर्भ
1. भक्तामर दर्शन – आचार्यदेव श्रीमदविजय राजयशसूरिजी
2. भक्तामर स्तोत्र – दिवाकर प्रकाशन


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3 Comments

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  1. sagar d
    जुलाई 5, 2012 #

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  2. Tattva Gyan
    जुलाई 5, 2012 #

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  3. sapna
    अप्रेल 27, 2013 #

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