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कर्म का मूल हिंसा

कर्म का मूल हिंसा

कम्ममूलं च जं छणं

जो क्षण है, वह कर्म का मूल है

‘क्षण’ शब्द ‘क्षणवधे’ इस तनादि गण की उभयपदी सकर्मक धातु से बना है, जिसका अर्थ है – हिंसा| वैसे इस शब्द के और भी अनेक अर्थ हैं – निमेषक्रिया का चतुर्थ भाग, उत्सव, अवसर आदि; परन्तु इस सूक्ति में उस का मूल अर्थ ‘वध’ या ‘हिंसा’ ही ठीक लगता है|

हिंसा कर्म का मूल है; ठीक वैसे ही जैसे दया धर्म का मूल है | अहिंसा, संयम और तप को उत्कृष्ट धर्म माना गया है; तो हिंसा, असंयम और कुतपको कर्म मानना चाहिये| धर्म कर्म का विरोधी शब्द है|

धर्म-साधना करने वाले कर्मबन्धन से दूर रहते हैं और इसके लिए हिंसा से-प्राणों का अतिपात करने से-प्राणियों की हत्या करने से अपने-आपको बचाये रखते हैं; क्यों कि हिंसा से धर्म का कोई सम्बन्ध नहीं हैं| धर्म का सम्बन्ध अहिंसा से है- यह एक प्रसिद्ध बात है|

वीतराग महापुरुषों ने विचार करके यह स्पष्ट घोषित कर दिया है कि धर्म का मूल अहिंसा और कर्म का मूल हिंसा है|

- आचारांग सूत्र 1/3/1

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