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समय को पहचानिये

समय को पहचानिये

अणभिक्कंतं च वयं संपेहाए,
खणं जाणाहि पंडिए

हे बुद्धिमान साधक! अवशिष्ट आयु को देखते हुए समय को पहचान-अवसर का मूल्य समझ

हीरा भी अमूल्य है और पत्थर भी; परन्तु दोनों की अमूल्यता में महान अन्तर है| हीरा इसलिए अमूल्य है कि उसका कोई मूल्य ही नहीं है| समय की अमूल्यता भी हीरे की तरह है| जो समय बीत जाता है वह लौट कर नहीं आता| लाखों-करोड़ों रुपये देकर भी उनके बदले में अपनी आयु को कोई एक क्षण भी नहीं बढ़वा सकता| यही समय की अमूल्यता है| समय के इस मूल्य का महत्त्व न समझने के कारण अब तक प्रमादवश जितना जीवन नष्ट हो चुका है, सो हो चुका; परन्तु अब भी जो कुछ बचा है; उसका सदुपयोग किया जा सकता है|

ज्ञानीजन परामर्श देते हैं कि अपने अवशिष्ट जीवन को सत्कार्यों में लगाना चाहिये, जिससे व्यतीत जीवन की तरह वह भी व्यर्थ नष्ट न हो जाये और इसके लिए आनेवाले अवसर का ठीक-ठीक मूल्य समझिये-समय को पहचानिये|

- आचारांग सूत्र 1/2/1

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