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लाभ – अलाभ

लाभ   अलाभ

लाभुत्ति न मज्जिज्जा, अलाभुत्ति न सोइज्जा

लाभ होने पर घमण्ड में फूलना नहीं चाहिये और लाभ न होने पर शोक नहीं करना चाहिये

प्रयत्न के दो ही परिणाम होते हैं – लाभ या अलाभ| प्रयत्न सफल होने पर लाभ होता है और असफल होने पर अलाभ| लाभ से प्रयत्न की प्रेरणा मिलती हैऔर अलाभ से प्रयत्न में शिथिलता आती है; परन्तु इसके साथ ही साथ दोनों अवस्थाओं में एक-एक दुष्परिणाम भी होता है| सो यह कि लाभ होने पर व्यक्ति फूल कर कुप्पा हो जाता है – वह अपने को बहुत बड़ा मानने लगता है और लाभ न होने पर वह शोकमग्न हो जाता है – अपने को तुच्छ मान बैठता है| इस प्रकार घमण्ड और शोक दोनों ही उसके पुरुषार्थ में बाधक बन जाते हैं – उसे पूरी शक्ति से प्रयत्न नहीं करने देते|

बुद्धिमान साधक घमण्ड और शोक से दूर रहता है| दोनों अवस्थाओं में अपनी मनोवृत्तियों पर वह अंकुश रखता है – भले ही लाभ हो या अलाभ|

- आचारांग सूत्र 1/2/5

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