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थूक न चाटें

थूक न चाटें

से मइमं परिय मा य हु लालं पच्चासी

बुद्धिमान साधक लार चाटने वाला न बने अर्थात् परित्यक्त भोगों की पुनः कामना न करे

जब आँखें खोलकर साधक दुनिया में यह देखता है कि लोग भोग से रोग के शिकार बनते हैं – वैद्यों और डाक्टरों के द्वार खटखटाते हैं – उनके लम्बे-लम्बे बिल चुकाते हैं; फिर भी रोगों के चंगुल से वे अपनी पूरी तरह पिण्ड नहीं छुड़ा पाते, एक के बादे एक कोई-न-कोई रोग शरीर में उत्पन्न होता ही रहता है; तो मन-ही-मन उसे भोगों से कुछ विरक्ति हो जाती है| इसी बीच यदि कहीं उसे विरक्त सन्तों का उपदेश सुनने का अवसर मिल जाये; तो वह भोगों का त्याग करके विरक्त जीवन स्वीकार भी कर लेता है|

परन्तु विरक्त जीवन की असुविधाएँ देखकर तथा भुक्त भोगों का स्मरण करके वह फिर उनकी ओर आकृष्ट होने लगता है – वह भोगों की रोगजनकता को भूल कर फिर से उनकी कामना करने लगता है| उसे त्याग मार्ग पर स्थिर करने के लिए ज्ञानीजन कहते हैं कि साधकों को चाहिये कि वे त्यागे हुए विषयों का भोग न करें – थूक न चाटें|

- आचारांग सूत्र 1/2/5

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