श्री ऋषभदेव जिन स्तवन
राग : मारु – ‘‘करम परीक्षा करण कुमार चाल्यो…’’ ए देशी
ऋषभ जिनेसर प्रीतम माहरो रे,
ओर न चाहुं रे कंत;
रीझ्यो साहिब संग न परिहरे रे,
भांगे सादि अनंत.
श्री ऋषभदेव जिन स्तवन
राग : मारु – ‘‘करम परीक्षा करण कुमार चाल्यो…’’ ए देशी
ऋषभ जिनेसर प्रीतम माहरो रे,
ओर न चाहुं रे कंत;
रीझ्यो साहिब संग न परिहरे रे,
भांगे सादि अनंत.
श्री महावीर जिन स्तवन
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दुलह नारी तुं बडी बावरी
पिया जागे तुं सोवे
पिया चतुर हम निपट अग्यानी
न जानु क्या होवे?
न जानु क्या होवे?
अनुभव ! तुं है हितु हमारो,
आय उपाय करो चतुराई, और को संग निवारो,
अनुभव ! तुं है हितु हमारो
अनुभव नाथ कुं क्युं न जगावे?
आतम अनुभव फूल की, नवली कोउ रीत;
नाक न पकरे वासना, कान गहे परतीत ॥
अनुभव नाथ कुं क्युं न जगावे?
ममता संग सो पाय अजागल-थनतें दूध दुहावे