1 0 Tag Archives: जैन सिद्धांत
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तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ

तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ
अब तु ले चलो उस पार| अपने से तो यह न हो सकेगा| यह भवसागर बड़ा है| दूसरा किनारा दिखाई भी नहीं पड़ता है| Continue reading “तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ” »

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गुरुदेव को वन्दन

गुरुदेव को वन्दन
गुरु भगवंत को विधिपूर्वक वन्दन करता हूँ… नमस्कार करता हूँ… सत्कार करता हूँ… सम्मान करता हूँ… Continue reading “गुरुदेव को वन्दन” »

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इच्छाएं कम करो

इच्छाएं कम करो

अप्पिच्छे सुहरे सिया
जीवन का घट पल-पल खाली हो रहा है उसी के साथ मन की इच्छाओं को कम करना होगा…. हमारी सारी आवश्यकताएं तो प्रकृति स्वतः पूरी कर देती है…. जरूरतों की पूर्ति में तो कोई झंझट है ही नहीं| Continue reading “इच्छाएं कम करो” »

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समता रखो

समता रखो
मेरी समता हर स्थिति में बनी रहे…..जो स्वीकार भाव की क्षमता को बढ़ा सकता है वही सुख-चैन से जी सकता है| Continue reading “समता रखो” »

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रत्नत्रय

रत्नत्रय

सुदेव सुगुरु सुधर्म आदरु
जैन धर्म में देव, गुरु, धर्म का बड़ा ही महत्त्व है| देव वे होते हैं जो वीतराग बन चुके हैं| गुरु वे हैं जो वीतराग बनने की साधना करते हैं और आत्मा को वीतराग मार्ग पर ले जाने वाली साधना को धर्म कहते हैं| इन तीनों को रत्नत्रय कहते हैं| Continue reading “रत्नत्रय” »

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आलोचना का महत्त्व



जंबुदीपे जे हुंति पव्वया, ते चेव हुंति हेमस्स| दिज्जंति सत्तखित्ते न छुट्टए दिवसपच्छितं॥
जंबुदीवे जा हुज्ज वालुआ, ताउ हुंति रयणाइ| दिज्जंति सत्त खिते, न छुट्टए दिवसपच्छित्तं॥

जंबूद्वीप में जो मेरु वगैरह पर्वत हैं, वे सब सोने के बन जाये अथवा तो जंबूद्वीप में जो बालू है, वह सब रत्नमय बन जायें| वह सोना और रत्न यदि सात क्षेत्र में दान देवें, तो भी पापी जीव इतना शुद्ध नहीं बनता, जितना भावपूर्वक आलोचना करके प्रायश्‍चित वहनकर शुद्ध बनता है| Continue reading “आलोचना का महत्त्व” »

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कषाय-निग्रह

कषाय निग्रह

चत्तारि एए कसिणा कसाया
आत्मा को मलिन बनाने वाला तत्त्व कषाय है| क्रोध, मान, माया और लोभ ऐसे विकार हैं जो हमारी आत्मा को विकलांग बना रहे हैं| Continue reading “कषाय-निग्रह” »

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पीछे नहीं…आगे देखिए

पीछे नहीं...आगे देखिए
अतीत का महत्त्व है इससे इन्कार नहीं है| उसे यूँ ही भुलाकर नहीं रहा जा सकता… परन्तु कदम-कदम पर अतीत की दुहाई देना… उसी से चिपटे रहना स्वयं को खतरे में डालना है| अतीत की स्मृति भले ही रहे परन्तु दृष्टि तो भविष्य की ओर केन्द्रित रहनी चाहिए…| हम क्या थे इसकी अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण यह देखना है कि अब हमें क्या बनना है?

समय के साथ आगे चलना और देखना जरूरी है| पिछले समय से तो मात्र शिक्षा लेनी चाहिए… यदि मनुष्य का पीछे की ओर देखना जरूरी होता तो आँखें आगे की बजाय पीछे होती| कहा जाता है कि भूत के पैर पीछे की ओर उलटे होते हैं… अतः इस बात को याद रखकर आगे बढ़ना|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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