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कामासक्ति

कामासक्ति

कामेसु गिद्धा निचयं करेन्ति

कामभोगों में आसक्त रहनेवाले व्यक्ति कर्मों का बन्धन करते हैं

पॉंच इन्द्रियों में से चक्षुइन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रिय अर्थात् आँख और कान के विषय ‘काम’ कहलाते हैं – जैसे सुन्दर चित्र, नाटक, सिनेमा, मनोहर दृश्य, नृत्य आदि आँख के विषय हैं और श्रृङ्गाररस की कथाएँ या कविताएँ, फिल्मी गाने, विविध वाद्य, अपनी प्रशंसा, स्त्रियों या पुरुषों का मधुरस्वर, (स्त्रियों के लिए पुरुषों की और पुरुषों के लिए स्त्रियों की मीठी-मीठी बातें) आदि चक्षु एवं कान के विषय हैं| Continue reading “कामासक्ति” »

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सत्य की आज्ञा

सत्य की आज्ञा

सच्चस्स आणाए उवट्ठिए मेहावी मारं तरइ

जो मेधावी सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है, वह मृत्यु के प्रवाह को तैर जाता है

जीवन में पद-पद पर अनुशासन की आवश्यकता का अनुभव होता है| विनय या अनुशासन से रहित अविनीत एवं स्वच्छन्द व्यक्ति अपने और दूसरों के कष्ट ही बढ़ाता है| ऐसी हालत में स्वपरकल्याण की तो उससे आशा ही कैसे की जा सकती है? Continue reading “सत्य की आज्ञा” »

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