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रत्नत्रय

रत्नत्रय

सुदेव सुगुरु सुधर्म आदरु
जैन धर्म में देव, गुरु, धर्म का बड़ा ही महत्त्व है| देव वे होते हैं जो वीतराग बन चुके हैं| गुरु वे हैं जो वीतराग बनने की साधना करते हैं और आत्मा को वीतराग मार्ग पर ले जाने वाली साधना को धर्म कहते हैं| इन तीनों को रत्नत्रय कहते हैं| Continue reading “रत्नत्रय” »

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कषाय-निग्रह

कषाय निग्रह

चत्तारि एए कसिणा कसाया
आत्मा को मलिन बनाने वाला तत्त्व कषाय है| क्रोध, मान, माया और लोभ ऐसे विकार हैं जो हमारी आत्मा को विकलांग बना रहे हैं| Continue reading “कषाय-निग्रह” »

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पीछे नहीं…आगे देखिए

पीछे नहीं...आगे देखिए
अतीत का महत्त्व है इससे इन्कार नहीं है| उसे यूँ ही भुलाकर नहीं रहा जा सकता… परन्तु कदम-कदम पर अतीत की दुहाई देना… उसी से चिपटे रहना स्वयं को खतरे में डालना है| अतीत की स्मृति भले ही रहे परन्तु दृष्टि तो भविष्य की ओर केन्द्रित रहनी चाहिए…| हम क्या थे इसकी अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण यह देखना है कि अब हमें क्या बनना है?

समय के साथ आगे चलना और देखना जरूरी है| पिछले समय से तो मात्र शिक्षा लेनी चाहिए… यदि मनुष्य का पीछे की ओर देखना जरूरी होता तो आँखें आगे की बजाय पीछे होती| कहा जाता है कि भूत के पैर पीछे की ओर उलटे होते हैं… अतः इस बात को याद रखकर आगे बढ़ना|

यह आलेख इस पुस्तक से लिया गया है
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यह मेरा नहीं है…

यह मेरा नहीं है...

एक उत्पद्यते जन्तुरेक एव विपद्यते
यह शरीर मेरा नहीं है|

यह घर मेरा नहीं है|

संसार की कोई भी जड़ चेतन वस्तु मेरी नहीं है|

क्या है तेरा ? Continue reading “यह मेरा नहीं है…” »

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भले की हो भावना

भले की हो भावना

शिवमस्तु सर्वजगतः
बहुत से याचक भीख मॉंगते वक्त बोलते हैं – दे उसका भी भला और न दे उसका भी भला! Continue reading “भले की हो भावना” »

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प्रशंसा हो या निंदा, सत्कर्म करते रहो

प्रशंसा हो या निंदा, सत्कर्म करते रहो

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत् प्राप्य चाप्रियम्
एक दिन एक संत अपने शिष्य को लेकर कहीं जा रहे थे| वह रास्ता बाजार से होकर निकलता था| दोनों ओर तरह-तरह की दुकानें लगी थी| Continue reading “प्रशंसा हो या निंदा, सत्कर्म करते रहो” »

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यह पुण्य से मिला है

यह पुण्य से मिला है

शुभानुबन्ध्यतः पुण्यं कर्त्तव्यं सर्वथा नरैः
उत्तम कुल में जन्म पुण्य से मिला है|

उत्तम मां-बाप पुण्य से मिले हैं|

मानव का देह पुण्य से मिला है| Continue reading “यह पुण्य से मिला है” »

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मेरा सिद्धान्त

मेरा सिद्धान्त

एगो मे सासओ अप्पा नाणदंसणसंजुओ
सुख धर्म से मिलता है|

दुःख पाप से मिलता है| Continue reading “मेरा सिद्धान्त” »

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साहसी बालक

साहसी बालक

परोपकारः कर्त्तव्यः प्राणैरपि धनैरपि
कलकत्ता की एक सड़क पर घोड़ागाड़ी दौड़ी जा रही थी| इस घोड़ागाड़ी में एक स्त्री अपने बच्चे के पास बैठी हुई थी| अचानक घोड़ा बिदक गया| कोचवान छिटककर दूर जा गिरा| घोड़ागाड़ी में बैठी स्त्री सहायता के लिए चीख-पुकार मचाने लगी| Continue reading “साहसी बालक” »

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