हमे इस जीव हिंसा के पाप से बचना होगा| Continue reading “जियो और जीने दो” »
लाइफ स्टाइलहमे इस जीव हिंसा के पाप से बचना होगा| Continue reading “जियो और जीने दो” »
करनी ऐसी कीजिए जिसे न जाने कोय|
जैसे मेहंदी पात में बैठी रंग छुपाय॥
काम करना आपका काम है…..बस सिर्फ काम करें…..नाम नहीं चाहें…..धर्म करना आपकी आत्मा का स्वभाव है, तो सम्मान की इच्छा मत करो|
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अनित्यं हि जगत् सर्वम्

आंखें जहां भी तुम देखो ऐसी हो जाएं शुद्ध कि वहीं परमात्मा दिखाई पड़े
इंद्रियां भी उसी के लिए द्वार बन सकती हैं| और हम इंद्रिय प्रार्थना में संलग्न हो सकती है| और उसी को हम कलाकार कहेंगे जो सारी इंद्रियों को परमात्मा में संलग्न कर दे; जो आत्मा से ही न पुकारे, देह से भी पुकारे| Continue reading “आंखें जहां भी तुम देखो” »

विप्र वेश में कोई यक्ष एक राजसभा में जा पहुँचा वहॉं उसने सबके सामने एक पहेली रखी – पॉंच मी पॉंच सी, पॉंच मी न सी
फिर वह बोला कि मैं परसों फिर यहॉं आऊँगा| यदि तब तक किसी ने इस पहेली का उत्तर नहीं दिया तो समझ लिया जायेगा कि इस राज्य में कोई पण्डित है ही नहीं|
राजा ने राजपण्डित से कहा कि यदि आप कल शाम तक इस पहेली का उत्तर नहीं खोज पाये, तो परसों प्रातःकाल ही आपका वध कर दिया जायेगा| यह पूरे राज्य की प्रतिष्ठा का सवाल है| बेचारा राजपण्डित निराश होकर किसी जंगल में जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया और विचार करने लगा| उसी पेड़ पर वही यक्ष अपनी प्रेयसी के साथ बैठा बातें कर रहा था|
प्रिये ! परसों तुम्हें अवश्य ही राजपण्डित का कलेजा खाने को मिल जायेगा| मैंने पहेली ही ऐसी पूछी है कि उसका उत्तर उसे सूझेगा ही नहीं और फिर परसों उसका निश्चित ही वध कर दिया जायेगा|
आपकी पहेली का अर्थ क्या है ? प्रेयसी ने पूछा|
पहेली पन्द्रह तिथियों पर आधारित है| पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी ये पॉंच मी वाली तिथियॉं हैं| एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णासी ये पॉंच सी वाली तिथियॉं हैं और एकम, दूज, तीज, चौथ और छठ इन पॉंचों में न मी है और न ही सी|
राजपण्डित ने यह सब सुन लिया| फिर वह घर चला गया| दूसरे दिन राजसभा में अर्थ बताकर उसने अपने प्राणों की रक्षा की|

अब तु ले चलो उस पार| अपने से तो यह न हो सकेगा| यह भवसागर बड़ा है| दूसरा किनारा दिखाई भी नहीं पड़ता है| Continue reading “तुम्हारे हाथ से डूब जाऊं तो भी उबर जाऊँ” »