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अदत्तादान और लोभ

अदत्तादान और लोभ

लोभाविले आययइ अदत्तं

लोभ से कलुषित जीव अदत्तादान (चोरी) करता है

जो वस्तु दे दी जाती है, वह दत्त है और जो नहीं दी गयी, वह अदत्त है| सज्जन केवल दत्त वस्तु को ही ग्रहण करना उचित समझते हैं, अदत्त वस्तु को नहीं|

अदत्त वस्तु पर उस वस्तु के स्वामी का ही अधिकार रहता है, किसी अन्य व्यक्ति का नहीं; इसलिए अदत्त को ग्रहण करना अपराध है|

यदि हमें किसी अदत्त वस्तु की अत्यन्त आवश्यकता हो; तो हम उसके स्वामी से मॉंग कर ले सकते हैं| बिना पूछे किसी की वस्तु – चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो, उठाना अनुचित है – अन्यायपूर्ण है|

अदत्त के आदान को व्यावहारिक भाषा में चोरी कहते हैं| हम नहीं चाहते कि कोई व्यक्ति हमारी किसी वस्तु को हमसे बिना पूछे ही उठा ले जाये अर्थात् चुरा ले जाये| इसी प्रकार दूसरे भी अपनी वस्तुओं की चोरी पसंद नहीं करते; इसलिए सज्जनता यही होगी कि सब लोग ईमानदारी से रहें – कभी किसी की कोई वस्तु चुराने का प्रयास न करें|

जो ऐसा प्रयास करता है, उसकी आत्मा लोभ से कलुषित रहती है अर्थात् जो लोभी है, वही अदत्तादान (चोरी) करता है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 32/26

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2 Comments

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  1. Amit Sancheti
    नवम्बर 13, 2012 #

    Awesome work… Appreciate the efforts taken

  2. Dilip Parekh
    अक्टूबर 24, 2016 #

    इसीलिए लोभ को पाप का बाप बताया गया है. लोभ के वश होकर मनुष्य क्या क्या नहीं करता ? चोरी, लूट, कपट, हिंसा इत्यादि.

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