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आत्मविजय

आत्मविजय

सव्वं अप्पे जिए जियं

अपने को जीतने पर सबको जीत लिया जाता है

अपने को जीतने का अर्थ है – मन को जीतना – मनोवृत्तियों को अपने वश में रखना|

मन घोड़े की तरह अत्यन्त बलवान है – चञ्चल है| उसे वश में रखना कोई साधारण कार्य नहीं है – बच्चों का खेल नहीं है|

घोड़े को वश में रखने के लिए – उसे विनीत बनाने के लिए जितना परिश्रम करना पड़ता है; उससे कई गुना अधिक परिश्रम मन को वश में रखने के लिए अपेक्षित है|

जैसे लगाम और चाबुक घोड़े को वश में रखने के लिए आवश्यक हैं, वैसे ही मन को वश में रखने के लिए संयम और तप की साधना आवश्यक है|

मन विकारग्रस्त हो कर विषयों की ओर दोड़ता है| उसे रोक कर यदि धर्मध्यान में लगा दिया जाये; तो आत्मकल्याण की साधना सुकर हो सकती है|

आत्मकल्याण के लिए अपनेआप को जीतना जरूरी है| जो अपने को नहीं जीत पाता, वह दूसरोंको भी नहीं जीत सकता| इसलिए मानना चाहिये कि सच्ची विजय आत्मविजय ही है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 6/36

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1 Comment

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  1. Dilip Parekh
    जुलाई 16, 2015 #

    वर्धमान महावीर के शिष्यों में चर्चा में चल रही थी कि मनुष्य के अधःपतन का क्या कारण है?
    किसी ने कामवासना बताया तो किसी ने लोभ, तो किसी ने अहंकार। आखिर वे शंका-समाधान करने के लिए महावीर के पास आए।
    महावीर ने शिष्यों से पूछा- “पहले यह बताओ कि मेरे पास एक अच्छा बढ़िया कमण्डलु है जिसमें पर्याप्त मात्रा में जल समा सकता है। यदि उसे नदी में छोड़ा जाए, तो क्या वह डूबेगा?”
    शिष्यों ने एक स्वर से जवाब दिया- “कदापि नहीं।“
    महावीर ने पूछा- “और यदि उसमें एक छिद्र हो जावे तो?”
    शिष्य- “तब तो डूबेगा ही।“
    महावीर- “यदि दायीं ओर हो तो?”
    शिष्य- “दायीं ओर हो या बायीं ओर! छिद्र कहीं भी हो, पानी उसमें प्रवेश करेगा ही और वह डूब जाएगा।“
    महावीर बोले- “तो बस जान लो कि मानव जीवन भी उस कमंडलु के समान ही है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मत्सर आदि सभी दुर्गुण उसे डुबाने के निमित्त कारण हो सकते हैं। किसी में कोई भेदभाव नहीं, प्रत्येक अपना-अपना असर करता है। इसलिए हमें सजग रहना चाहिए कि कहीं हमारे जीवन रूपी कमंडलु में कोई छिद्र तो नहीं हो रहा है।“

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