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बुद्धिमान में नम्रता

बुद्धिमान में नम्रता

नच्चा नमइ मेहावी

बुद्धिमान ज्ञान पा कर नम्र हो जाता है

जिन वृक्षों पर फल लग जाते हैं, उनकी डालियॉं झुक जाती हैं; इसी प्रकार जिन मनुष्यों में ज्ञान पैदा हो जाता है, वे नम्र हो जाते हैं|

फलों के भार से डालियों का झुकना अनिवार्य नहीं है; परंतु ज्ञान पाकर व्यक्तियों का नम्र होना अनिवार्य है| फलों की संख्या सीमित होती है; परंतु ज्ञान असीम होता है; इसलिए फलों से ज्ञान की तुलना कुछ अंशों तक ही की जा सकती है|

स्वाति नक्षत्र में बादल से गिरी बूँद मोती बन जाती है, परन्तु उसका मोती बनना अनिवार्य नहीं है| सीप में वह मोती बनेगी, किन्तु सॉंप के मुँह में रही विष बन जायेगी | यही बात ज्ञान के लिए भी कही जा सकती है| जिसमें मिथ्यात्व होता है, वह ज्ञान का दुरुपयोग करता है; किन्तु जिसमें सम्यक्त्व होता है, वह उसका सदुपयोग करता है| दुष्ट व्यक्ति ज्ञान से स्वार्थ सिद्ध करता है – दूसरों को धोखा देता है; परन्तु शिष्ट व्यक्ति ज्ञान से परमार्थ सिद्ध करता है – दूसरों का उद्धार करता है|

ज्ञानवृद्धि से बुद्धू (मूर्ख) घमण्डी बन जाता है; किंतु बुद्धिमान नम्र (विनीत) हो जाता है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 1/45

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