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सुखद और दुःखद

सुखद और दुःखद

खणमित्तसुक्खा बहुकालदुक्खा

विषयभोग क्षणमात्र सुख देते हैं, किंतु बहुकाल पर्यन्त दुःख देते हैं

दिन के बाद रात और रात के बाद दिन अथवा अँधेरे के बाद उजाला व उजाले के बाद अँधेरा क्रम से आता रहता है, उसी प्रकार सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख का आगमन जीवन में होता रहता है – अनुकूल परिस्थितियॉं पा कर कभी हम हँसते हैं तो प्रतिकूल परिस्थितियॉं पा कर रोते भी हैं|

जो सुख आता-जाता रहता है, वह क्षणिक होता है और विषय-सामग्री के भोग से प्राप्त होता है| क्षणभर के लिए हमें विषय-भोग सुखी बनाते हैं- सुखका अनुभव कराते हैं, परन्तु फिर चिरकाल पर्यन्त दुःख का अनुभव कराते रहते हैं|

ज्ञानी कहते हैं कि एक सुख और होता है – आध्यात्मिक सुख, जो बिना किसी बाह्य सामग्री के भीतर से प्राप्त होता है और चिरस्थायी होता है| वह आत्मस्वरूप को भली भॉंति समझने से और उस पर गहराई से चिन्तन करने से प्राप्त होता है| प्रयास करने पर प्रत्येक व्यक्ति उसे पा सकता है| हमें उसी को पाने के लिए प्रयत्न करना है, विषयभोगजन्य क्षणिक सुखों को नहीं|

- उत्तराध्ययन सूत्र 14/13

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1 Comment

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  1. Sugyan Modi
    जून 4, 2013 #

    जीवन सुख-दुख की पूर्वजन्मउपार्जित गठड़ी हैं.

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