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मित्र-शत्रु कौन ?

मित्र शत्रु कौन ?

अप्पा मित्तममित्तं य, सुप्पट्ठियदुप्पट्ठियो

सदाचार-प्रवृत्त आत्मा मित्र है और दुराचारप्रवृत शत्रु

अपनी आत्मा ही मित्र है – यदि वह सुप्रवृत्त हो अर्थात् सदाचारनिष्ठ हो और अपनी आत्मा ही शत्रु है – यदि वह दुष्प्रवृत्त हो अर्थात् दुराचारनिष्ठ हो|

सुप्रवृत्ति आत्मा को ऊँचा उठाती है – सद्गति में ले जाती है और दुष्प्रवृत्ति आत्मा को नीचे गिराती है – दुर्गति में ले जाती है|

शुभप्रवृत्ति या सदाचार की प्रेरणा सद्भाव से मिलती है और अशुभ प्रवृत्ति या दुराचार की प्रेरणा दुर्भाव से|

सद्भाव और दुर्भाव की जन्मभूमि मन है, जिसे अन्तःकरण या अन्तरात्मा कहते हैं|

अन्तरात्मा विकृत होकर जब दुर्भावों द्वारा प्राणी को दुर्गति में ले जाती है, तब वह अपनी शत्रु है|

इसके विपरीत शुद्ध रहकर जब सद्भावों द्वारा वह प्राणी को सद्गति की ओर ले जाती है, तब अपनी मित्र है| इस प्रकार आत्मा ही अपना मित्र है और वही अपना शत्रु|

- उत्तराध्ययन सूत्र 20/37

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