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विरक्त साधक

विरक्त साधक

विरता हु न लग्गंति,
जहा से सुक्कगोलए

मिट्टी के सूखे गोले के समान विरक्त साधक कहीं भी चिपकता नहीं है

मिट्टी का गीला गोला यदि दीवार पर फैंका जाये; तो वह दीवार से चिपक जायेगा; क्यों कि जल से मिट्टी में चिपकने का गुण पैदा हो जाता है|

जीव भी संसार में रहकर संसार में चिपक जाता है; क्यों कि उसमें मोह के कारण चिपकने की मनोवृत्ति पैदा हो जाती है| यदि मिट्टी का जल सूख जाए तो वह मिट्टी का सूखा गोला किसी भी दीवार पर नहीं चिपक सकता| जीव का भी यदि मोह छूट जाये – राग नष्ट हो जाये; तो ऐसा विरक्त जीव फिर कभी सांसारिक वस्तु में आसक्त नहीं हो सकता – चिपक नहीं सकता|

संसारी जीव को संसार में रहना तो पड़ता है, क्योंकि जब तक कर्मों का भार आत्मा पर लदा है, तब तक भवभ्रमण से पिण्ड नहीं छूट सकता| फिर भी जब तक वह संसार में रहे, उसे मोह छोड़ने का – विरक्त बनने का अभ्यास करना चाहिये| जल में कमल की तरह निर्लिप्त रहनेवाला विरक्त साधक ही अपनी सिद्धि पाने में सफल हो सकता है|

- उत्तराध्ययन सूत्र 25/43

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