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क्षमा का जन्म

क्षमा का जन्म

कोहविजएणं खंतिं जणयइ

क्रोधविजय क्षमा का जनक है

अपराधी चाहता है कि यदि उसे क्षमा कर दिया जाये तो कितना अच्छा रहे| यदि पापी अपने पापों के लिए लज्जित हो रहा हो – अपने किये हुए अपराधों के लिए उसके हृदय में वास्तविक पश्‍चात्ताप हो रहा हो; तो उसे अवश्य क्षमा कर देना चाहिये|

सच्चे हृदय से किया गया पश्‍चात्ताप व्यक्ति को अपराधों से रोकता है – इस प्रकार अपराधी सुधर जाता है – पापी धर्मात्मा बन जाता है और इसका पूरा श्रेय मिलता है क्षमावीर को|

क्षमा ही वीरों का भूषण है – वीरता का लक्षण है – निर्भयता का प्रतीक है| क्षमारूपी ढाल जिसके पास हो, क्रोध रूपी तलवार उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती – बाल भी बॉंका नहीं कर सकती|

परन्तु इस क्षमागुण का जन्म तभी हो सकता है, जब क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली जाये| जब तक मन में क्रोध रहेगा, तब तक उसमें क्षमा का जन्म असंभव है| क्रोध और क्षमा परस्पर विरोधी हैं| अपने क्रोध पर अंकुश रखिये – विजय पाइये और क्षमा का जन्म अपने आप हो जाएगा!

- उत्तराध्ययन सूत्र 26/67

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