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सूक्ष्म शल्य

सूक्ष्म शल्य

सुहुमे सल्ले दुरुद्धरे

सूक्ष्म शल्य बड़ी कठिनाई से निकाला जा सकता है

जो लोग पैदल चलते हैं, उन्हें मार्ग में कॉंटे चुभ जायें तो वे क्या करते हैं? दूसरे कॉंटे से अथवा सूई से निकाल लेते हैं| यद्यपि कॉंटा निकल जाने पर भी वेदना बनी रहती है, फिर भी कुछ समय बाद मिट जाती है और कुछ दिन बाद तो उसका छेद भी गायब हो जाता है| चमड़ीसे चमड़ी मिल जाती है|

यह तो हुई स्थूल कॉंटे की बात, परन्तु एक सूक्ष्म कॉंटा भी होता है – रागद्वेष का, जो मन में चुभता है | उसे निकालना सरल नहीं है| सभी प्राणी उस कॉंटे की चुभन का अनुभव करते हैं और उससे जीवनभर परेशान रहते हैं| विरले व्यक्ति ही उसे निकालने का प्रयास करते हैं और प्रयास करनेवालों में से भी विरलों को ही उसमें सफलता मिल पाती है|

सूई से जैसे पॉंव में चुभा कॉंटा निकाला जाता है, वैसे ही सूत्रों से (जैन-आगमों से) मन में चुभा वह रागद्वेष का शल्य भी निकाला जा सकता है | स्वाध्याय, चिन्तन, मनन आदि से ही उस सूक्ष्म शल्य का उद्धार सम्भव है|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/2/2/12

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