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सोचकर बोलें

सोचकर बोलें

अणुचिंतिय वियागरे

सोचकर बोलें

इस दुनिया में मौन रहने से काम नहीं चल सकता| व्यवहार के लिए कुछ-न-कुछ सबको बोलना पड़ता है| पशु पक्षी भी बोलते हैं| उनकी भाषा अलग होती है, संकेत अलग होते हैं; जिनके माध्यम से वे अपनी भावनाओं को प्रकट करते हैं – आवश्यकताओं की अभिव्यक्ति करते हैं|

मनुष्य पशु-पक्षियों से अधिक बुद्धिमान प्राणी है; इसलिए अपनी सूक्ष्म भावनाओं को प्रकाशित करने के लिए उसने अधिक विकसित भाषा का आविष्कार किया है और विशाल शब्दकोष से उसे समृद्ध किया है|

समृद्ध शब्दकोष के कारण मनुष्य बोलता भी अधिक है और अनेक उलझनें पैदा कर लेता है| उनके जाल में फँसकर वह स्वयं भी दुःखी होता है और दूसरों को भी दुःखी करता है|

वैसे जीवन में संयम की हरएक क्षेत्र में आवश्यकता है; परन्तु सबसे अधिक आवश्यकता वाणी के क्षेत्र में (अनुभव होती) है| यदि मनुष्य की वाणी संयमित हो – नपीतुली हो – सोचकर बोली गई हो तो वह बोलनेवाले को अधिक लोकप्रिय बना देगी| साधुओं के लिए तो वाणी के संयम की और अधिक आवश्यकता है| वे जो कुछ बोलें, पूरी तरह सोच कर बोलें|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/6/25

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