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तप से पूजा की कामना न करें

तप से पूजा की कामना न करें

नो पूयणं तवसा आवहेज्जा

तप के द्वारा पूजा (प्रतिष्ठा) की अभिलाषा नहीं करनी चाहिये

कल्पना कीजिये – एक नौका में बैठकर कुछ यात्री नदी पार कर रहे हैं| वे देखते हैं कि नौका में पानी भरने लगा है और इससे धीरे-धीरे नौका डूबने की सम्भावना पैदा हो गई है| वे तत्काल नौका के छिद्रों को ढूँढते हैं, जहॉं से पानी भीतर प्रवेश कर रहा है| फिर उन छिद्रों को बन्द कर देते हैं| इससे पानी आना बन्द हो जाता है| कुछ यात्री उसमें भरे हुए जल को दोनों हाथों से उलीचते हैं – बाहर फैंकते हैं|

इसी प्रकार आत्मा आस्रवों का संवर करने के बाद सञ्चित कर्मों को नष्ट करने के लिए – शास्त्रीय शब्दों में कहा जाये तो कर्मों की निर्जरा करने के लिए तप करती है| बस, यही तप का उद्देश्य है| इसी पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए साधकों को तप करना चाहिये; लोगों से पूजा-प्रतिष्ठा, आदर-सत्कार या प्रशंसा पाने के लिए नहीं; अन्यथा उसका यथेष्ट फल प्राप्त न हो सकेगा| इसीलिए ज्ञानियों ने कहा है – ‘तप से पूजा की कामना न करें’|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/7/27

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