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मायामृषावाद

मायामृषावाद

सादियं न मुसं बूया

मन में कपट रखकर झूठ नहीं बोलना चाहिये

झूठ बोलना बुरा है; परन्तु उसकी बुराई की मात्रा का निर्णय तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक यह पता नहीं लग जाता कि झूठ बोलने का कारण और प्रयोजन क्या है|

कुछ लोग अपना अपराध छिपाने के लिए झूठ बोलते हैं| अपराध की स्वीकृति से मिलनेवाले ‘दण्ड’ का भय उन्हें अपराध छिपाने की प्रेरणा देता है; परन्तु इससे अपराध करने की मनोवृत्ति नष्ट नहीं होती| फलतः मिथ्यावादी क्रमशः पतित होता जाता है| उसका सुधार असम्भव हो जाता है – उसके उत्थान की आशा नही’ रह जाती|

कुछ लोग दूसरों के प्राण बचाने के लिए भी झूठ बोलते हैं| अहिंसा की भावना से प्रेरित होकर बोला गया यह झूठ पवित्र होता है – पुण्यवर्धक होता है, पाप नहीं|

कुछ लोग स्वार्थ सिद्धि के लिए झूठ बोलते हैं| इनके मन में कपट होता है – दूसरों को धोखा देने की भावना होती है| शास्त्रीय भाषा में इसे मायामृषावाद कहते हैं| यह बहुत बड़ा पाप है| इससे प्रत्येक व्यक्ति को बचना चाहिये| पूरी जानकारी न होने से अज्ञानवश बोला गया झूठ उपेक्षणीय भी हो सकता है; परन्तु धूर्त्ततावश बोला गया यह मायामृषावाद अक्षम्य है|

- सूत्रकृतांग सूत्र 1/8/16

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