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गुरु विनय

गुरु विनय

जस्संतिए धम्मपयाइं सिक्खे,
तस्संतिए वेणइयं पउंजे

जिसके निकट रह कर धर्म के पद सीखे हों, उसके प्रति विनयपूर्ण व्यवहार रखना चाहिये

पद का अर्थ है – शब्द | धर्मपद का अर्थ है – ऐसे शब्द, जिनसे धर्म की शिक्षा मिलती हो| ऐसे शब्द धर्मशास्त्रों में पाये जाते हैं, इसलिए धर्मशास्त्रों की व्याख्या करने वाला धर्मगुरु है|

धर्मगुरुओं के निकट रह कर जिसने धर्मशिक्षा ग्रहण की हो, उसे उनके प्रति सदा कृतज्ञ रहना चाहिये| अकृतज्ञ या उपकार न मानने वाला शिष्य कभी धर्मगुरुओं से पूरा लाभ नहीं पा सकता|

इसके विपरीत जब गुरुओं को यह विश्‍वास हो जाता है कि अमुक शिष्य कृतज्ञ है – विनीत है; तो उसके सामने वे अपना हृदय खोल कर रख देते हैं| जो कुछ वे जानते हैं, सब सिखाने को तत्पर हो जाते हैं|

अतः ज्ञानियों का कथन है कि धर्मशास्त्रों का उपदेश करने वाले उन धर्मगुरुओं के प्रति, जिनसे हमने धर्म के पद सीखे-समझे-हृदयङ्गम किये हों, हमें सदा विनयपूर्ण व्यवहार रखना चाहिये; क्यों कि ज्ञान की कुञ्जी ही है-गुरुविनय !

- दशवैकालिक सूत्र 6/1/12

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