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प्रेम का नाशक

प्रेम का नाशक

कोहो पीइं पणासेइ

क्रोध प्रीति का नाशक है

प्रेम और क्रोध दोनों किसी स्थान पर एक साथ नहीं रह सकते | जब क्रोध होगा, प्रेम नहीं होगा और जब प्रेम होगा, क्रोध नहीं होगा| दोनों गुण एक दूसरे के विरोधी हैं – एक दूसरे के नाशक हैं|

प्रेम कोमल मनोवृत्ति है और क्रोध कठोर| प्रेम चुम्बक है, क्रोध दूसरों को अपने से दूर भगाता है ! प्रेम के बदले प्रेम मिलता है; तो क्रोध के बदले क्रोध; इसलिए यदि हम नहीं चाहते कि हम पर कोई क्रोध करे; तो हमें भी दूसरों पर क्रोध नहीं करना चाहिये – यदि हम चाहते हैं कि सब लोग हमसे प्रेम करें; तो हमें भी दूसरोंसे प्रेम करना चाहिये|

इसी प्रकार क्रोध और प्रेम – ये दोनों मनोवृत्तियॉं किसी व्यक्ति में एक साथ नहीं रह सकतीं| जिस समय किसीको क्रोध आ रहा हो, उसी समय उसमें प्रेम की पवित्र भावना भी विद्यमान हो-ऐसा सम्भव नहीं है और जिस समय हृदयसागर में प्रेम की लहरें उठ रही हों, उसी समय उसमें क्रोध का ज्वालामुखी नहीं फूट सकता|

ज्ञानियों ने कहा है कि सब प्राणियों से मैत्री रखो – प्रेम करो, क्रोध किसी पर न करो; क्यों कि क्रोध प्रेम का नाशक है|

- दशवैकालिक सूत्र 8/38

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