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लोभ को छोड़िये

लोभ को छोड़िये

लोभमलोभेण दुगंछमाणे
लद्धे कामे नाभिगाहइ

लोभ को अलोभ से तिरस्कृत करनेवाला साधक प्राप्त कामों का भी सेवन नहीं करता

लोभ एक कषाय है| वह क्रोध, अभिमान और माया की तरह आत्मा को कलुषित करता है – उसकी साधना में बाधक बनता है| जैसे अन्य कषाय आत्म-शुद्धि के लिए त्याज्य हैं, वैसे ही लोभ भी त्याज्य है| लोभ को पाप का बाप कहा जाता है; क्योंकि वह सभी पापों का जनक है| उसकी प्रेरणा से ही अन्य सब पाप किये जाते हैं यदि लोभ शान्त हो जाये; तो अन्य पापों की प्रवृत्ति पर अपने आप ही अंकुश लग जाता है|

प्रश्‍न यही है कि लोभ को शान्त कैसे किया जाये – उस पर विजय कैसे पायी जाये ? उत्तर है – अलोभ से यानी सन्तोष से | सन्तोष लोभ का विरोधी है| सन्तोष शान्ति देता है; किन्तु लोभ अशान्ति पैदा करता है| फिर भी लोग लोभ के चक्कर में पड़कर अशान्त बनते ही रहते हैं| इसके विपरीत लोभ को जीतनेवाले साधक तो प्राप्त कामों के सेवन में भी रुचि नहीं रखते; फिर अप्राप्त कामों की तो बात ही क्या है? अतः कहते हैं – शान्ति पाना हो; तो लोभ को छोड़िये|

- आचारांग सूत्र 1/2/2

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