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न अपनी आशातना करो न दूसरों की

न अपनी आशातना करो न दूसरों की

नो अत्ताणं आसाएज्जा, नो परं आसाएज्जा

न अपनी आशातना करो, न दूसरों की

जो लोग हीन-मनोवृत्ति के शिकार होते हैं – अपने को तुच्छतम समझते हैं, वे इस दुनिया में उन्नति नहीं कर सकते | उनमें अपना विकास करने का – प्रगतिपथ पर आगे बढ़ने का साहस तक नहीं हो सकता – जीवनभर वे अपने को अक्षम ही समझते रहते हैं और अक्षम ही बने रहते हैं|

इससे उल्टी मनोवृत्ति वाले दूसरों को अपने से तुच्छ समझते हैं और दूसरों के गुणों को नहीं देखते | वे अपने ही घमण्ड में चूर रहते हैं और ‘अपने मुँह मियॉं मिट्ठू’ बनते हैं| कोई उनकी जरा भी प्रशंसा कर दे; तो फूल कर कुप्पे बन जायेंगे; परन्तु स्वयं किसी की प्रशंसा कभी नहीं करेंगे| उनमें ऐसी दृष्टि ही नहीं होती कि वे दूसरों के सद्गुणों को परख सकें और उनका सन्मान कर सकें|

इन दोनों भयंकर हानिकर मनोवृत्तियों से दूर रहने का परामर्श देते हुए अनुभवियों ने कहा है – न अपने को तुच्छ समझो, न दूसरों को – न अपनी आशातना करो, न दूसरों की|

- आचारांग सूत्र 1/6/5

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