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विनय

विनय

जे एगं नाम से बहुं नामे

जो एक अपने को नमा लेता है; वह बहुतों को नमा लेता है

यदि हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारा विनय करें; तो हमें भी दूसरों का विनय करना चाहिये| जो घमण्ड करता है, वह सबसे घृणा पाता है – उसे कहीं भी आदर नहीं मिल सकता|

घमण्ड का विरोधी गुण है विनय| जो विनीत है, सब उसका सन्मान करते हैं| विद्या का फल भी विनय है | विनय से पात्रता पैदा होती है और वह व्यक्ति सभी सद्गुणों का और सन्मान का पात्र बन जाता है| जो स्वयं झुकता है, वही एक दिन अपने सद्गुणों के कारण इतना महान पद प्राप्त कर लेता है कि सब उसके सामने झुकने लगते हैं|

इसीलिए ज्ञानियों का उपदेश है कि अन्य सद्गुणों की साधना करने से पहले विनय को अपनाओ – विनीत बनो| विनय से अन्य सद्गुणों की साधना सरल हो जाती है; क्योंकि सभी सद्गुणों का मूल है – विनय!

- आचारांग सूत्र 1/3/4

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3 Comments

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  1. Rahma Kushtana
    मई 2, 2016 #

    Thank You.

  2. Amritlal Jain
    मई 5, 2016 #
  3. Amritlal Jain
    मई 5, 2016 #

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