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सत्य की आज्ञा

सत्य की आज्ञा

सच्चस्स आणाए उवट्ठिए मेहावी मारं तरइ

जो मेधावी सत्य की आज्ञा में उपस्थित रहता है, वह मृत्यु के प्रवाह को तैर जाता है

जीवन में पद-पद पर अनुशासन की आवश्यकता का अनुभव होता है| विनय या अनुशासन से रहित अविनीत एवं स्वच्छन्द व्यक्ति अपने और दूसरों के कष्ट ही बढ़ाता है| ऐसी हालत में स्वपरकल्याण की तो उससे आशा ही कैसे की जा सकती है?

इस प्रकार अनुशासन जीवन के लिए एक आवश्यक गुण है| आज्ञा का पालन करने से अनुशासन का परिचय मिलता है| जो सेवक स्वामी की आज्ञा का व्यवस्थित रूप से पालन करता है, उस पर स्वामी प्रसन्न होता है – उसे पदोन्नत करता है – पुरस्कृत करता है, परन्तु आध्यात्मिक क्षेत्र में गुणों का आधिपत्य रहता है| सत्य सर्वोत्कृष्ट गुण है; इसलिए वही सबका स्वामी है| जो सत्य की आज्ञा का पालन करता है, वह अनुशासित सेवक गुणस्थानों में पदोत होता रहता है और आत्मशान्ति द्वारा पुरस्कृत भी| यहॉं तक कि वह मृत्युसागर को भी तैर जाता है – यदि सर्वथा पालन की जाये-सत्य की आज्ञा तो!

- आचारांग सूत्र 1/3/3

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