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सदा जागृत

सदा जागृत

सुत्ता अमुणी, मुणीणो सया जागरंति

जो सुप्त हैं, वे अमुनि है मुनि तो सदा जागते रहते हैं

जो अमुनि हैं-असाधु हैं; जिनमें साधुता या साधकता का अभाव है, वे आलसी लोग सोते रहते हैं| जो सोते हैं, उनकी आँखें बन्द रहती हैं और उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता| इसी प्रकार जो असाधु हैं; उनके विवेक – चक्षु बन्द रहते हैं और इसीलिए उन्हें अपने कर्त्तव्य अकर्त्तव्य का भान नहीं रहता| वे किंकर्त्तव्यविमूढ़ बने रहते हैं|

इसके विपरीत जो मुनि हैं, साधु हैं; साधना के पथ पर चलनेवाले हैं, वे सदा जागृत रहते हैं – उनके विवेकचक्षु खुले रहते हैं – कोई न कोई कर्तव्य सदा उनके सामने खड़ा रहता है| एक कर्त्तव्य पूरा होने पर दूसरा और दूसरे के बाद तीसरा सामने आता रहता है और वे उसका पालन करने में निरन्तर व्यस्त रहते हैं|

इसी दृष्टि से कहा गया है कि अमुनि सदा सुप्त रहते हैं और साधु सदा जागृत|

- आचारांग सूत्र 1/3/1

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